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देश के लिए आधी सैलरी छोड़ देते थे राजेंद्र प्रसाद! इस नेता ने कहा था ‘सादगी की मूरत’

Posted On: 3 Dec, 2017 Politics में

Avanish Kumar Upadhyay

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बिहार का शायद ही कोई विद्यार्थी हो जिसे घर, स्कूल या राह-चलते किसी से कभी यह न सुनने को मिला हो कि पढ़ो तो राजेंद्र बाबू जैसा। कहा भी क्‍यों न जाए, आखिर उनकी परीक्षा की कॉपी पर परीक्षक ने लिख दिया था ‘द एग्‍जामिनी इज बेटर दैन द एग्‍जामिनर’। मगर राजेंद्र बाबू की महिमा एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी के रूप में किंवदंति बन जाने में या वकालत के चमकते पेशे को छोड़कर महात्मा गांधी के पीछे लग जाने में नहीं है। कहा जाता है कि वकालत के दिनों में जिरह के वक्त जब राजेंद्र प्रसाद के सामने खड़े वकील मामले में नजीर पेश करने में नाकाम रहते थे, तो जज की कुर्सी से कहा जाता था कि डॉ. प्रसाद… अब आप ही इनकी तरफ से कोई नजीर पेश कीजिए। 3 दिसंबर 1984 को जन्‍मे राजेंद्र प्रसाद का जीवन देश सेवा में बीता। उन्‍हें सादगी की मिसाल कहा जाता है। उनकी जिंदगी से जुड़े कई किस्‍से हैं। उनमें से कुछ किस्‍से आज हम आपको बता रहे हैं, जिन्‍हें जानकार आपको भी गर्व होगा।


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एक पल के लिए भी नहीं भूले साधारणता की ताकत

राष्ट्रपति पद पर रहते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद साधारणता की ताकत को एक पल के लिए भी नहीं भूले। राष्ट्रपति भवन में रहे, लेकिन जिंदगी ऐसी रखी कि जब चाहे गांव के सबसे गरीब आदमी को गले लगा सकें। सोचिए कैसा रहा होगा वह मनुष्य, जिसका नाम लो तो गांव के बुजुर्ग आज भी बताएं कि तनख्वाह तो उनकी 10 हजार थी, लेकिन आधा पैसा सरकार के खाते में ही छोड़ देते थे कि देश की सेवा में लग जाए। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के परिवारवाले कहते हैं कि ‘बाबूजी ने राष्ट्रपति रहते अपने बाद के दिनों में वेतन का सिर्फ एक चौथाई (2500 रुपये) लेना मंजूर किया था’।


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सारे उपहार सरकारी खजाने को लौटाए

इस वेतन पर भी किसी ने अंगुली उठायी। लिखा मिलता है कि राष्ट्रपति पद पर रहते राजेंद्र बाबू ने कार खरीदी। किसी ने ध्यान दिलाया कि इतने वेतन में कार तो नहीं खरीदी जा सकती। बस क्या था, बात की बात में उन्होंने कार लौटा दी। राष्ट्रपति रहते बस एक चीज जमा की थी और वो थी विदेश से कोई मेहमान आए तो उसके दस्तखत, जो अपने पास संजोकर रखते थे। पद पर रहते हुए जितने उपहार मिले, सबके सब उन्होंने सरकारी खजाने को लौटाए। परिवार के लोगों के साथ भी यही व्यवहार रखा। घर में बेटियों की शादी होती थी, तो प्रथा के मुताबिक उन्हें साड़ी भेंट करनी होती थी, लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति को यह मंजूर न था कि साड़ी खरीदकर दी जाए। खुद बुनते थे और वही बुनी हुई खद्दर की साड़ियां ससुराल जाती बेटियों को उपहार में मिलीं।


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सरकारी सुविधा पर नहीं कराया उपचार

मन में पद को लेकर रत्ती भर भी गुमान नहीं आया। कहा जाता है कि घर के बच्चे मिलने आते थे, तो पत्नी यही बताती थीं कि ‘ये तुम्हारे दादाजी हैं, ना कि यह कि देश के राष्ट्रपति हैं’। ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब उनके घर के लोगों ने राष्ट्रपति का परिजन होने के नाते सार्वजनिक जीवन में किसी सहूलियत या सुविधा की मांग उठायी हो। सादगी की एक मिसाल यह भी है कि 12 साल राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद जब यह ओहदा छोड़ा और सेहत ने दगा देना शुरू किया, तब भी दिल्ली में रहकर सरकारी सुविधा पर बेहतर उपचार कराना ठीक न समझा। कोई घर-मकान नहीं लिया। कहा, ‘लौटकर वहीं जाऊंगा जहां से चलकर आया हूं’। आखिरी वक्त में गंगा के घाट के एकदम नजदीक पटना के सदाकत आश्रम में रहे


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राधाकृष्‍णन ने कहा था ‘सादगी की मूरत’

देश की संविधान सभा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी को रेखांकित किया था। उनके अध्यक्ष पद पर आसीन होने पर अपने भाषण में सर एस. राधाकृष्णन ने कहा कि इस संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद सादगी की मूरत हैं, उसकी ताकत के प्रतीक। यही भारत का दुनिया को धर्मोपदेश (गॉस्पेल) भी है। महाभारत में कहा गया है कि सादगी सबसे बड़ी कठिनाई पर विजय पा सकती है और सादगी सबसे कोमल पर भी जीत हासिल करती है…Next


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