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जब एक दिन के लिए मुख्‍यमंत्री बना यह नेता, अगले ही दिन मिल गई बड़ी जिम्‍मेदारी

Posted On: 5 Nov, 2017 Politics में

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भारतीय राजनीति के दिग्‍गज और विवादित नेताओं में शामिल अर्जुन सिंह की आज जयंती है। अर्जुन सिंह का राजनीतिक कॅरियर विवादों से जुड़ा रहा। दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी माने जाने वाले भोपाल गैस कांड के दौरान उनकी भूमिका सवालों के घेरे में आई। अयोध्‍या में राम मंदिर विवाद मामला और कुख्यात डाकुओं के समर्पण से लेकर वर्ष 2004 में सोनिया गांधी की जगह मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने तक के सियासी हलचलों को उन्होंने नजदीक से देखा। अपने लंबे राजनीतिक कॅरियर के दौरान वे मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री समेत राज्य और केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। एक समय ऐसा भी आया, जब अर्जुन सिंह एक दिन के लिए मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने और अगले ही दिन उन्‍हें दूसरे प्रदेश में बड़ी जिम्‍मेदारी दे दी गई। आइये आपको बताते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी रोचक बातें।


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1957 में लड़ा पहला विधानसभा चुनाव

अर्जुन सिंह का जन्म 5 नवंबर 1930 को मध्यप्रदेश के सीधी जिले के चुरहट कस्बे में एक राजपूत घराने में हुआ था। इनके पिता राव शिव बहादुर सिंह भी राजनीति में थे। 1957 में अर्जुन सिंह ने पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। 1963 में वे द्वारका प्रसाद मिश्रा की सरकार में मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री रहे और सरकार के इसी कार्यकाल में जनसंपर्क विभाग में भी मंत्री रहे। 1967 में उन्होंने एक बार फिर मध्‍यप्रदेश की कांग्रेस सरकार में योजना और विकास मंत्री का कार्यभार संभाला। 1972 से 1977 के बीच वे मध्यप्रदेश के शिक्षामंत्री रहे। 1977 में मध्‍यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद अर्जुन सिंह को राज्य में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।


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मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के अगले दिन ही दिया इस्‍तीफा

1980 में फिर मध्‍यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई और अुर्जन सिंह को बड़ी जिम्‍मेदारी मिली। सियासत में 23 साल लंबा सफर पूरा करने के बाद अर्जुन सिंह पहली बार 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 9 जून 1980 से 10 मार्च 1985 तक बतौर मुख्‍यमंत्री अपना पहला कार्यकाल पूरा किया। 1985 में हुए चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अर्जुन सिंह मात्र एक दिन के लिए सूबे के मुख्‍यमंत्री बने। इस बार उनका कार्यकाल 11 मार्च 1985 से 12 मार्च 1985 तक रहा, क्‍योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्‍हें पंजाब में शांति बहाली के लिए राज्यपाल नियुक्त कर दिया था। ऐसे में अर्जुन सिंह को शपथ लेने के अगले ही दिन मुख्‍यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद वे तीसरी बार 14 फरवरी 1988 से 24 जनवरी 1989 तक मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहे।


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यूपीए सरकार में रहे मानव संसाधन विकास मंत्री

1991 के आम चुनावों में अर्जुन सिंह ने सतना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इस चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस सरकार बनी और पहली बार अर्जुन सिंह को केंद्र सरकार में शामिल किया गया। उन्हें नरसिम्‍हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद 1996 और 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में अर्जुन सिंह को सतना और होशंगाबाद सीट से हार का सामना करना पड़ा। 2000 में अर्जुन सिंह राज्यसभा के लिए मध्य प्रदेश से चुने गए। 2004 से 2009 के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में अर्जुन सिंह मानव संसाधन विकास मंत्री रहे।


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नरसिम्‍हा राव से कभी नहीं बनी

राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्‍हा राव प्रधानमंत्री बने और उनसे अर्जुन सिंह की कभी नहीं बनी। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले के बाद अर्जुन सिंह ने प्रधानमंत्री के खिलाफ मुखर रूप अख्तियार कर लिया था। उन्होंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी भी लिखी थी। 1994 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, तो कुछ ही समय के भीतर उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया। नरसिम्‍हा राव से चली राजनीतिक खींचतान की वजह से आखिरकार उन्हें कांग्रेस से बाहर होना पड़ा। उन्होंने एनडी तिवारी की अध्यक्षता में तिवारी कांग्रेस का गठन किया। ये कांग्रेस ज्यादा सफल नहीं हो सकी और उसके टिकट पर अर्जुन सिंह खुद 1996 में लोकसभा का चुनाव मध्यप्रदेश के सतना से हार गए। इसके बाद अर्जुन सिंह कांग्रेस में वापस लौट आए।


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विवादों से रहा नाता

अर्जुन सिंह से कई विवाद जुड़े। मध्‍यप्रदेश के भोपाल में 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में भीषण गैसकांड हुआ, जिसमें हजारों लोग मारे गए। इस दौरान अर्जुन सिंह मध्‍यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। खबरें आई कि राहत कार्य की बजाय अर्जुन सिंह परिवार समेत अपनी जान बचाने के लिए सरकारी हेलीकॉप्टर से भोपाल से दूर निकल गए। यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी और फिर उसे देश से सुरक्षित निकल जाने देने पर अर्जुन सिंह की भूमिका सवालों के घेरे में रही थी। 1980 में मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अर्जुन सिंह का नाम चुरहट लॉटरी घोटाले में भी आया। हालांकि, उन पर इस मामले में आरोप साबित नहीं हुआ। 2005-06 के दौरान आरक्षण के मुद्दे पर भी इनके बयान विवादों में रहे। अर्जुन सिंह के दौर में चंबल के बड़े डकैतों ने सरेंडर कर दिया था। मलखान सिंह, फूलन देवी, पान सिंह और घनश्याम सिंह जैसे डकैतों के समर्पण के लिए अर्जुन सिंह ने एक नीति बनाई थी।


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