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बिहार में फिर सुनाई देने लगी वो ‘समोसे में आलू...’ वाली कहावत

Posted On: 31 Aug, 2017 Politics में

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एक समय था जब कहा जाता था… ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू’। इसके बाद एक दौर वो भी आया, जब लालू प्रसाद यादव बिहार की सियासत में धुंधले पड़ने लगे। ये वो दौर था, जब 2005 में बिहार की सत्‍ता पर भाजपा के साथ नीतीश कुमार काबिज हुए। अब करीब एक दशक बाद वो ‘समोसे में आलू…’ वाली कहावत फिर सुनाई देने लगी है। ऐसे में यह सवाल आना लाजिमी है कि आखिर बिहार की सियासत में धुंधले पड़ रहे लालू प्रसाद यादव पर चमक डाली किसने। इसके जवाब में घूम-फिरकर अंगुली कभी लालू के मित्र, तो कभी धुर विरोधी नीतीश कुमार की तरफ ही रुकती है।


nitish lalu


बिहार की राजनीति का ‘डूबता सूरज’ हो गए थे लालू

बिहार की राजनीति में लालू और नीतीश कभी धुर विरोधी, कभी मित्र, तो कभी फिर प्रतिद्वंद्वी बने। सन् 2005 में नीतीश कुमार के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद लालू परिवार बिहार की सत्‍ता से दूर होता चला गया। इस दौरान 2004 से 2009 तक लालू बिहार छोड़कर बतौर रेल मंत्री केंद्र की राजनीति में रहे। नीतीश के दूसरी बार मुख्‍यमंत्री बनने पर लालू की पार्टी हाशिये पर जाती दिखने लगी। इसी बीच 2013 में लालू जेल चले गए और उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गई। इन स्थितियों को देखते हुए सियासी पंडित, लालू प्रसाद यादव को बिहार की राजनीति का डूबता सूरज मानने लगे।


LALU NITISH


नीतीश के साथ सत्‍ता में जबरदस्‍त वापसी

कहा जाता है राजनीति में कभी भी, कुछ भी संभव है। इसी का एक और उदाहरण बना बिहार का 2015 विधानसभा चुनाव। इस चुनाव में महागठबंधन बना, जिसमें सबसे खास था लालू और नीतीश का साथ आना। यही उस समय की शुरुआत थी, जब बिहार की राजनीति में धुंधले पड़ते लालू पर रोशनी पड़नी शुरू हुई। लालू और नीतीश ने कांग्रेस के साथ मिलकर बिहार में महागठबंधन की सरकार बनाई। इसमें लालू के दोनों बेटों को सरकार में बड़े पद मिले। लालू का पहला दांव यहीं सफल हुआ। अब उनके दोनों बेटों की बिहार की सियासत में एक बड़ी पहचान बन गई थी। एक बेटे को उपमुख्‍यमंत्री और एक को कैबिनेट में जगह दिलाकर लालू ने अपनी अचूक चाल चल दी और शायद सत्‍तासीन होने की वजह से नीतीश इसे समझने में नाकाम रहे।


nitish kumar


नीतीश ने इस्‍तीफा देकर भी दिया मौका!

दोनों बेटों को सरकार में बड़े और महत्‍वपूर्ण पद दिलाकर लालू ने बिहार की सियासत में अपनी धाक जमा ली। करीब डेढ़ साल सरकार चलाने के बाद लालू के छोटे बेटे और तत्‍कालीन उपमुख्‍यमंत्री तेजस्‍वी यादव पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगे। इसी पर जेडीयू ने तेजस्‍वी का इस्‍तीफा मांगना शुरू कर दिया। तेजस्‍वी के इस्‍तीफा न देने पर नीतीश ने खुद इस्‍तीफा दे दिया। इससे एक झटके में लालू परिवार व उनकी पार्टी बिहार की सत्‍ता से बाहर हो गई। मगर लालू राजनीति के पुराने खिलाड़ी कहे जाते हैं। शायद यही वो समय था, जब नीतीश ने लालू को दूसरा मौका दिया।


lalu family


मंत्री के बाद बेटों को बनाना था नेता

लालू के दोनों बेटे नीतीश के विरोध में मुखर हुए। राजद में कई वरिष्‍ठ नेता होने के बावजूद तेजस्‍वी यादव को नेता विपक्ष बनाया गया। तेस्‍वजी ने भी नीतीश को हर स्‍तर पर घेरकर बतौर नेता विपक्ष खुद को साबित करना शुरू किया। लगातार नीतीश और भाजपा का विरोध कर रहे लालू अब बिहार की सियासत में चमकने लगे थे। इसके बाद हाल ही में राजद ने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्‍व में बिहार में ‘भाजपा भगाओ देश बचाओ’ रैली का आयोजन किया, जिसमें भीड़ जुटाने में भी वे सफल रहे। रैली में लालू के दोनों बेटे एक नेता की तरह नीतीश और भाजपा के खिलाफ मुखर नजर आए। जिस नीतीश ने लालू को बिहार की सत्‍ता से लगभग बेदखल सा कर दिया था, उसी नीतीश ने लालू को बिहार की राजनीति में एक बार फिर चमकता हुआ सूरज बना दिया।


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