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परिधान भी बने देश की पहचान

Posted On: 30 May, 2016 Infotainment में

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सन 1893, शिकागो की सड़कों पर केसरिया रंग की धोती, अगोंछा और पगड़ी बांधे एक नौजवान चला जा रहा था. इस तरह के परिधान से अंजान इस शहर के निवासी उस गहरे रंग की चमड़ी वाले नौजवान को बेहद सशंकित निगाह से घूर रहे थे. उस नौजवान के पीछे चल रही एक औरत अपने पति से अंग्रेजी में बुदबुदाती है, “मुझे नहीं लगता यह आदमी एक भद्र पुरूष है.”


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इस महिला की आवाज उस नवयुवक के कानों में भी पहुंचती है. वह नवयुवक उस महिला से मुखातिब होता है और बड़े ही विनम्र लहजे में कहता है कि, “माफ कीजिए, आपके देश में किसी व्यक्ति का दर्जी उसे भद्र पुरूष बनाता है पर मेरे देश में, जहां से मैं आया हूं व्यक्ति का चरित्र उसे भद्र पुरूष बनाता है.”


यह नौजवान कोई और नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व करने गए युवा सन्यासी स्वामी विवेकानंद थे. अमेरिकी समाज तब भी एक उपभोक्तावादी समाज था और  उसने अध्यात्म और त्याग का रसास्वादन कभी नहीं किया था पर धर्म संसद के समाप्त होते-होते स्वामी विवेकानंद ने अमेरकियों को भारत के बारे में अपने पूर्वाग्रह पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया. उनका भगवा वस्त्र भारत की गौरवशाली संस्कृति और राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिक बन गया.


स्वामी विवेकानंद की अमेरिका यात्रा के 121 साल बाद भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा पर गए लेकिन उनकी अमेरिका यात्रा के प्रारंभ होने से पहले ही देशी-विदेशी मीडिया में उनके संभावित परिधानों पर कयासों का बाजार गर्म हो गया. भले ही नरेंद्र मोदी विवेकानंद को अपना आदर्श बताते हों लेकिन विवेकानंद से विपरीत मोदी की पहचान एक ऐसे नेता की है जो अपने परिधानों के चुनाव में अत्यधिक सतर्कता बरतता है.


1893 में स्वामी विवेकानंद ने जो कहा उसमें तब के भारत की संस्कृति और दर्शन की झलक मिलती है, पर मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनके परिधानों पर इतनी चर्चा हुई कि मीडिया ने उनके दर्जी को ढूंढ निकाला और विश्व ने ये माना कि आज के मोदी के निर्माण में उनके चरित्र के साथ-साथ उनके दर्जी का भी योगदान है.


भारतीय राजनीति का चरित्र भले ही सादगी पसंद रही हो पर यहां के राजनेताओं के परिधान समय-समय पर चर्चा के विषय बनते रहें हैं. मोहनदास करमचंद गांधी, महात्मा गांधी तभी बन सके जब कोट-टाई त्यागकर लंगोट धारण कर लिया. विंस्टन चर्चिल ने कभी महात्मा गांधी को “आधा नंगा फकीर” कहकर उपहास किया था, पर इसी फकीर के नेतृत्व में भूखे-नंगों की फौज ने जिनका यह फकीर नेता था, अंग्रेजी साम्राज्य की जड़े उखाड़ डालीं.


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आजादी की लड़ाई के दौरान गांधी जहां अपनी सादगी के लिए चर्चित रहे वहीं जवाहर लाल नेहरू अपनी शानो-शौकत के लिए. जहां गांधी सिर्फ एक लंगोट और गमछा धारण किए रहते वहीं नेहरू की बंद गले की जैकेट उनकी पहचान बन गई. आगे चलकर यह जैकट नेहरू जैकट के नाम से विख्यात हुई. सन 2012 में टाईम पत्रिका ने ‘नेहरू जैकेट’ को शीर्ष 10 राजनीतिक पहनाओं में शामिल किया. खैर नेहरू जैकेट एक फैशन स्टेटमेंट के तौर पर 60 के दशक में ही लोकप्रिय हो गई थी जब यूरोप और अमेरिका के बाजार नेहरू के बंद गले की जैकेट को ‘नेहरू जैकेट’ के नाम से बेचना शुरू किया. ‘बीटल’ और ‘मॉन्की’ जैसे पॉप ग्रुपों ने नेहरू जैकेट की लोकप्रियता को और बढ़ाया.


नेहरू ने भले ही गांधी से अलग पहनावा अपनाया, पर अपना सर ढ़कने के लिए उन्होंने गांधी की साधारण सी खद्दर की टोपी ही अपनाई. 1907 से 1914 के बीच गांधी ने ये टोपी साउथ अफ्रिका में अंग्रेजों की रंगभेद नीति के विरोध में लगाई थी. कलांतर में यह टोपी गांधी टोपी के नाम से विख्यात हुई. भारत आने के बाद गांधी ने इस टोपी का इस्तेमाल नहीं किया, पर गांधी से जुड़े होने के कारण नेहरू और कांग्रेस के अन्य बड़े नेता समेत आम कार्यकर्ताओं ने भी यह टोपी अपना ली.


कांग्रेस ही नहीं गांधी टोपी को हिंदु महासभा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ .ने भी अपनाया, पर इसका रंग बदलकर काला हो गया. सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने इसी आकार की खाकी टोपी पहनी. लोहिया के विरासत पर दावा करने वाली मुलायम सिंह के नेतृत्व में गठित समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के सिर पर पहुंचते-पहुंचते इस टोपी का रंग लाल हो गया.


धीरे-धीरे यह टोपी अपना महत्व खोने लगी थी, पर 2011 के अन्ना आंदोलन के दौरान गांधी टोपी न सिर्फ संघर्ष का प्रतीक बनी बल्कि फैशन स्टेटमेंट भी बन गई. इस आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी यह टोपी पहनना जारी रखा, पर टोपी पर ‘मैं अन्ना हूं’ की जगह ‘मैं हूं आम आदमी’ लिखा जाने लगा. जल्द ही गांधी की यह टोपी भाजपाईयों के सर पर भी सजने लगी, पर अब इसका रंग भगवा हो गया जिसपर ‘मोदी फॉर पीएम’ लिखा गया.


जहां तक बात महिला राजनेताओं की है तो सर पे आंचल रखे इंदिरा गांधी में एक घरेलू महिला के साथ-साथ सख्त प्रशासक की भी छवि नजर आती है. 1999 में जब सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा तो अपने सासू मां की इसी छवि को सार्वजनिक जीवन में अपनाया और 2004 में उनके नेतृत्व में यूपीए गठबंधन एनडीए को हराकर सत्ता में आई.


एक तरफ जयललिता और मायावती जैसी नेत्रियों ने अपने महंगे वस्त्रों और आभूषणों के कारण चर्चा बटोरी तो वहीं ममता बनर्जी जैसी नेत्री हवाई चप्पल और सूती साड़ी पहनकर बंगाल से तीस साल पुराना कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ने में सफलता पाई…Next


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Taron के द्वारा
July 11, 2016

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