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अपने फैसलों के कारण इन जजों को भी जीना पड़ा मौत के साये में

Posted On: 27 Jul, 2015 Politics में

Mukesh Kumar

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हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जिन्हें यह लगता है कि किसी न्यायालय में नियुक्त न्यायधीश सबसे शक्तिशाली होते हैं. वो जो चाहे वो कर सकते हैं. उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता. जबकि वास्तविकता केवल यह नहीं है. वास्तविकता का दूसरा पक्ष यह है कि कई न्यायधीशों को उनके फैसलों के लिये धमकी के साये में जीना पड़ता है. जान जाने या किसी नुकसान की धमकी के साये में जीना जितना मुश्किल होता है उतना ही मुश्किल होता है उस हालत में न्यायिक प्रक्रिया को जारी रख पाना. हमारे देश में किसी मामले में सज़ा होने के भय से अपराधी या रसूख वाले लोग न्यायाधीशों को जान से मारने की धमकी देने से भी नहीं चूकते. हमारे बीच कुछ ऐसे न्यायाधीश हैं जिन्हें अदालती फैसलों के बरक्स धमकियाँ मिली हैं. जानिये ऐसे ही न्यायधीशों के बारे में…



judges threatened



ज्योत्सना याग्निक

नरोदा पाटिया में हुए वर्ष 2002 के दंगे में ज्योत्सना याग्निक बतौर विशिष्ट न्यायाधीश नियुक्त थी. इस मामले में अदालत ने 32 लोगों को दोषी ठहराया जिसमें भारतीय जनता पार्टी की नेत्री और भूतपूर्व मंत्री माया कोडनानी और बजरंग दल के भूतपूर्व नेता बाबू बजरंगी शामिल थे. अगस्त 2012 में जारी हुए इस फैसले के बाद ज्योत्सना याग्निक को धमकी भरे 22 पत्र भेजे गये. इसके अलावा उन्हें कई ब्लैंक फोन किये गये. उनकी शिकायत के बाद उन्हें ज़ैड प्लस सुरक्षा दी गयी.


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सुधीर अग्रवाल

वर्ष 2010 के अगस्त में बाबरी मस्जिद मामले में फैसला सुनाने वाले न्यायधीशों में सुधीर अग्रवाल शामिल थे. उनके अनुसार वर्ष 2011 की जुलाई महीने में गाज़ियाबाद से गुजरते वक़्त उनकी गाड़ी को असामाजिक तत्वों ने रोक लिया था. एटीएस के उप महानिरीक्षक ने इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दिये अपने हलफनामें में इसकी जानकारी दी थी.


डी वी शर्मा

डी वी शर्मा भी बाबरी मस्जिद मामले में फैसला सुनाने वाले न्यायधीशों में शामिल थे. उन्होंने रजिस्ट्रार को लिखित आवेदन दिया जिसमें उत्तराखंड सरकार द्वारा उन्हें पर्याप्त सुरक्षा न देने की शिकायत की.


एस यू खान

अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद की भूमि के बँटवारे का फैसला देने वाले तीन न्यायधीशों की पीठ में एस यू खान भी थे.

बाबरी मस्जिद मामले में राज्य सरकार ने तीनों न्यायाधीशों को पूरी सुरक्षा देने की कोशिशें की. तीन न्यायाधीशों की पीठ को ज़ैड प्लस सुरक्षा दी गयी. न्यायाधीश एस यू खान ने किसी भी तरह की सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया.


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शिवनाथ

रायबरेली में पूर्व मंत्री मनोज पाण्डेय के भाई की हत्या का मामला त्तकालीन अपर सत्र न्यायाधीश शिवनाथ की अदालत में चल रहा था. न्यायधीश ने इस मामले में फैसला सुनाने से मना कर दिया. उनके इंकार की वजह उन्हें व उनके परिवार को मिली जान से मारने की धमकी थी.


ये वो गिने-चुने मामले हैं जो सार्वजनिक रूप से सामने आये. न्यायाधीशों को जान से मारने की धमकी के उन मामलों की कल्पना हमारी आँखों के सामने भयावह स्थिति पैदा करती है जो किसी वजह से सामने नहीं आ पाती.Next…..


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