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अगर आप अटल की इस कला को जानेंगे तो नरेंद्र मोदी को भूल जाएंगे

Posted On: 24 Dec, 2014 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बहुत कम लोग जानते होंगे कि अपनी भाषण शैली के लिए मशहूर और शायद भारत के सबसे पॉपुलर नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों के लिए भारत ही नहीं पूरी दुनिया में मशहूर रहे हैं. 80 के दशक में टाइम मैगजीन ने आचार्य ओशो रजनीश के साथ अटल बिहारी वाजपेयी को एशिया के सबसे प्रभावशाली वक्ता की लिस्ट में शामिल किया था.  1996 में अटल ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अमेरिकी संसद में हिंदी में भाषण दिया. अटल बिहारी की यह भाषण शैली भाजपा के भी बहुत काम आई. कांग्रेस को किनारे कर पहली बार 5 सालों तक एक स्थिर सरकार दे पाने में सफल रहने में अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.


Atal Bihari Vajpayee


अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक समय भाजपा भारत की सबसे पॉपुलर पार्टी बन सकी थी. अब वापस वही पॉपुलरिटी भाजपा नरेंद्र मोदी को पीएम इन वेटिंग के रूप में चुनावी मैदान में उतारकर पाना चाहती है. नरेंद्र मोदी कई बार अटल जी का जिक्र भी अपने भाषणों में कर चुके हैं. 1998 के चुनावों में अटल जी और भाजपा की एक अलग ही लहर थी जो भाजपा के लिए जीत की लहर बनी. आज वह लहर मोदी लहर के रूप में एक बार फिर बह रही है लेकिन सौ टके का सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी का मुकाबला कर सकते हैं?


Atal Bihari Vajpayee as a orator

1999 से 2004 तक पहली बार कांग्रेस को बीट कर सत्ता में रहने का सुख भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला. उसके बाद से लेकर अब तक दो लोकसभा चुनावों में दुबारा सत्ता में आने के लिए बीजेपी ने एड़ी-चोटी की जोर लगा ली लेकिन भाजपा को दिल्ली नहीं मिली. 2004 में लाल कृष्ण आडवाणी की ‘इंडिया शाइनिंग’ की कैंपेन भी लोकसभा चुनाव के नतीजों में फुस्स साबित हुई. अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी नेतृत्व के चेहरे से दूर रखना इस हार की बड़ी वजह मानी जाती रही. 1998 के चुनावों में पीएम पद के लिए भाजपा का नेतृत्व चेहरा अटल बिहारी वाजपेयी ही थे. 2004 और उसके बाद के चुनावों में अटल को इससे दूर और आडवाणी के नेतृत्व में आने के साफ-साफ संकेत थे और जनता ने सीधे-सीधे इसे नकार दिया. अब नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा वाजपेयी की तरह चमत्कारिक चुनाव परिणामों की उम्मीद कर रही है पर वाजपेयी और अटल बिहारी में बहुत फर्क है.

एक झूठ को सौ बार बोलो तो सच बन जाता है


Atal Bihari Vajpayee and Modi


अपने विरोधियों को भी अपनी चुटकी लेने के अंदाज से निरुत्तर कर देने वाले और मुस्कुराने को बाध्य कर देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी और बात-बात पर विरोधियों पर सीधा निशाना साधते, बस अपनी ही अपनी तारीफें करते नरेंद्र मोदी किस तरह जुदा हैं हम आपको बता रहे हैं.


समानताएं

मोदी और वाजपेयी जी में एक मात्र समानता यही है कि दोनों ही अपने भाषणों के लिए देश-विदेश में पॉपुलर हैं लेकिन दोनों की पॉपुलेरिटी अलग तरह की है. कैसे? आगे समझ जाएंगे.


एक चुनावी भाषण के दौरान मोदी के इस स्टेटमेंट पर ध्यान दें:

मैं कामदार हूं, वे नामदार हैं. ऐसे बड़े नामदार एक कामदार से मुकाबला करना बुरा मानते हैं, खुद का अपमान मानते हैं


इंटरनेट और मीडिया में मोदी के भाषण रिसर्च का विषय रहे हैं लेकिन अपने बहुत प्रभावी अंदाज के कारण नहीं बल्कि अपने बड़बोलेपन के कारण. इन्हीं रिसर्च रिपोर्टों की मानें तो आंकड़े कुछ इस तरह निकलते हैं:

-अपने 20 मिनट के भाषण में मोदी कम से कम 5356 शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनमें कम से कम 25 बार गुजरात का जिक्र जरूर होता है.

-मोदी द्वारा अब तक दिए कुल 68 भाषणों में 1335 बार गुजरात का जिक्र किया गया है.

- और तो और शुरुआत में तो अपने भाषणों के लिए गलत ऐतिहासिक तथ्यों के प्रयोग के लिए भी मोदी की अच्छी-खासी हाय-तौबा मचाई गई. मोदी के कई भाषणों में ऐसी कई ऐतिहासिक बातें कही गईं जिनका इतिहास में या तो कोई जिक्र ही नहीं या वह तथ्य कुछ और था. जैसे:


मोदी के भाषणों के कुछ फैक्चुअल एरर्स

-बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय से संबधित भाषण (बिहार में तक्षशिला विश्वविद्यालय है ही नहीं)

-श्यामा प्रसाद मुखर्जी (भाजपा के संस्थापक) को कांग्रेस का बताया

-सिकंदर को बिहार में हारने की बात कही (इतिहास के अनुसार सिकंदर कभी बिहार गया ही नहीं).

-चीन द्वारा अपने जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा के लिए खर्च किए जाने की बात कही जबकि चीन के आंकड़े कहते हैं वह अपनी जीडीपी का मात्र 3 प्रतिशत से कुछ अधिक ही खर्च करता है.

इसके अलावे,

-फैक्ट्स अक्सर गलत

-कोई प्रभावशाली अंदाज नहीं

-विरोधियों पर सीधा निशाना

-अपने तीखे तेवर के लिए हमेशा विरोधियों के निशाने पर

मोदी के सामने एक नई चुनौती


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अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों की विशेषताएं

-प्रभावशाली अंदाज

-फैक्ट्स सही

-विरोधियों पर सीधा निशाना निशाना नहीं, चुटीला अंदाज

-विरोधी भी प्रशंसक में शामिल


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तुलनात्मक तराजू पर अटल-मोदी

-मोदी के भाषण अपनी और अपने द्वारा गुजरात में किए विकास की तारीफ से ही शुरू और उसी पर खत्म होते हैं जबकि अटल जी के भाषणों में देश और विकास की बातें होती थीं.

-उनके भाषणों से ऐसा लगता है जैसे चुनावी लड़ाई भाजपा से कांग्रेस की नहीं बल्कि मोदी से कांग्रेस की हो.

-अटल जी ने अपने भाषणों में विरोधियों पर कभी सीधी चोट नहीं की. विरोधियों पर कटाक्ष वे भी करते थे लेकिन चुटकी लेने का अंदाज उनका कुछ ऐसा होता था कि अपने ही ऊपर कटाक्ष पर विरोधी हंस पड़ते थे. इसके ठीक विपरीत अपने भाषणों में कभी कांग्रेस को ‘खूनी पंजा’ तो कभी राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कहकर संबोधित करने के लिए नरेंद्र मोदी तीखे विरोध का सामना कर चुके हैं.


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हाल ही में उमा भारती ने कहा कि अटल जी एक पॉपुलर वक्ता थे इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन मोदी की रैली में लोग उनका भाषण सुनने नहीं बल्कि उन्हें जताने आते हैं कि वे मोदी के साथ हैं. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का मोदी के लिए एक स्टेटमेंट कुछ इस तरह है:

”सशक्त और फौलादी इरादों के साथ-साथ जिसके अंदर संवेदनशीलता है, ऐसा नेतृत्व अगर किसी के पास है तो वह केवल (भाजपा) भारतीय जनता पार्टी के पास है, और इस नेतृत्व का नाम है श्री नरेंद्र कुमार मोदी जिन्हें हम 2014 लोकसभा चुनाव में भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं”– राजनाथ सिंह


इस जगह पार्टियां और जनता अपनी-अपनी राय दे सकती हैं पर इसके मायने दूसरे होंगे. असल रूप में इस वक्ता से अर्थ एक सुयोग्य शासक से है भले ही जनता या पार्टियां इसे न समझें. प्रधानमंत्री रहते हुए एक बार मोदी के साथ ही किसी प्रेस कांफ्रेंस में अटल जी के वक्तव्य थे:

शासक के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता, न जन्म के आधार पर, न जाति के आधार पर, न संप्रदाय के आधार पर,….मुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं.

इशारों-इशारों में कुछ कहता है यह ‘लोक’ तंत्र

क्या भाजपा इस सदमे के लिए तैयार है?

इनकी मौत में आश्चर्यजनक समानताएं थीं

Web Title : comparison between narendra modi and atal bihari vajpayee speeches



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394 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Keylon के द्वारा
July 11, 2016

Hi there this is kind of of off topic but I was wanting to know if blogs use WYSIWYG editors or if you have to manually code with HTML. I’m starting a blog soon but have no coding expertise so I wanted to get advice from someone with experience. Any help would be greatly aprdpciatee!

Ram Vilas के द्वारा
December 27, 2014

IS LEKH SE IRSHYA KEE BU AA RAHI HAI, WEBSITE NIRMATAON KO ESE LOGO SE OR VAHIYAT LEKH SE BACHNA CHAHIYA. MAIN IS LEKH KO TATHYA PURN NAHI SAMAJHTA HUN. ANYATHA NE LEN. NAMASKAAR SAHIT

Rajendra SinghDangwal के द्वारा
April 16, 2014

Indian politice is base on successor it not a good indication for democracy .I am presenting following line of Alexander Pop” for form of government lets fool contest .What ever is best administration is best .The history of five thausand years is known As sun is raising most of it height in middle of day than dascend down In same way on government can not stay long therefore the chang will come soon and new persons and government will came in curtain .I wish Indian democrcy will live long

keshavdattbadu के द्वारा
April 14, 2014

des bachaoo modi laoo

kirti verma के द्वारा
April 12, 2014

अगर मोदी गुजरात का बार-बार जिक्र करते भी हैँ तो भी इसमेँ कुछ गलत नहीँ। गुजरात का उदाहरण देकर मोदी का एकमात्र उद्देश्य अपने काम को दिखाना है । अटल जी और मोदी अलग-अलग व्यक्तित्व के हैँ । भले ही मोदी अटल जी से बेहतर वक्ता न होँ , फिर भी निस्संदेह समकालीन वक्ताओँ मेँ सर्वश्रेष्ठ हैँ और प्रशासकोँ मेँ भी ।

sanjeevsingh के द्वारा
April 8, 2014

des bachaoo modi laoo or des basiyo my name sanjeev aap se yhi gujaris karuga ki des ko n0 1pe des ko lana he to modi laoo

Vidrohi Savarkar के द्वारा
April 8, 2014

चुनावी Rally aur bhashan history ki class aur examination ki preparation karane wali jagahein nahi hoti. Bhashano me saari batein ati shookshma tathya parak hi nahi ki jati balki dher saari baatein Sthool Sanketik aur symbolic hoti hai. jo public ke mood ko dekhte hue usme utsah bharne ke liye ek achche neta (Leader) dwara kahi jati hai……. Aise kisi bhi uddharan ko lekar virodh ki mansha rakhne wale log koi bhi kahani garh sakte hai……..Nalanda aur Takshshila ati Pracheen kaal se Bharat ke gaurav rahe hai.. ek doosre ke sahyogi aur poorak ke me roop Bharat ke sandarbh me dono hi vishwavidyalayon ke naamon ka ullekh vyakti samanyataya ek saath hi karta hai…..Aaj ka Bihar aur Pracheen Magadh Samrajya ek hi nahi hai…Bhartiya Itihaas ke sabse aguravsaali prishtha Magadh samrajya ke naam se hi likhe hote hai… Us Magadh ka udgam aur mukhya kshetra ke kush bhaag aaj ke Bihar me padte hai Jisme Nalanda zaroor hai per kya Jaankaron ko yeh nahi pata ki Bharat ke Itihaash ke sabse gauravshali samayon me yah desh Brihattar Bharat ke Roop me raha hai aur usme bhi adhiktam samay yah netritva Magadh ke netritva me raha hai aur us gauravshali Magadh me Hamesha Nalanda aur Takshshila ek hi samrajya ke anga rahe hai…….Aur Modi jaise Leader ek Aitihashik gauravshali rajya me jakar us rajya ke janutshahvardhan ke liye Mahattam gaurav pradarshit karne wale atiutshahvardhak ullekh hi rakhne ka prayash karega………..Aur rahi baat Bajpai ji se Tulna ki to Bajpai ji to koi bhi tulna nahi kar sakta………Wo to Bhooto na bhavishyati hain……… Modi ka apna karishma hai…..

Ashutosh के द्वारा
April 7, 2014

Modi can’t be atal g, neither today nor never..

    ramnath kumar के द्वारा
    April 8, 2014

    Modi ka statement bilkul sahi tha ,Sikandar Bihar gaya tha aur use Bihar me hi har ka muh dekhana pada tha……Above mentioned statement is totaly wrong. those who mentioned it ,please try to study again ur history…..


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