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वो भी एक समय था जब कमरे के लिए एक पंखा तक नहीं खरीद सके थे चाचा नेहरू

Posted On: 14 Nov, 2014 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भारतीय राजनीति का इतिहास इतना विस्तृत है जिसकी कोई हद नहीं. स्वतंत्रता के सुनहरे पन्नों को पलटते जाइए तो कुछ ना कुछ ऐसे नए तथ्यों से अवगत होंगे जिसके बारे में आपने कभी सुना नहीं है. अंग्रेजों की गुलामी से भारत ने जब अपनी स्वतंत्रता का स्वाद चखा तो उसके सामने कई बड़ी मुश्किलें थीं लेकिन कहते हैं ना कि जहां चाह होती है वहां राह अपने आप नजर आती है.


nehru

भले ही आज के नेतागण, जो पैसे और सत्ता की चकाचौंध की वजह से अंधे हो गए हैं, में यह चाहत कम ही नजर आती हो लेकिन पहले के नेता ऐसे नहीं थे. उनकी जीवनशैली बेहद सामान्य हुआ करती थी, क्योंकि वह अपनी जिम्मेदारी समझते थे और यह जानते थे कि जनता उन्हें अपना आदर्श मानती है और उनके ऊपर देश के विकास का भार है. कुछ इसी का तरह का उदाहरण प्रस्तुत करते थे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू.


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आन बान और शान का प्रतीक कहे जाने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू की गिनती भी उन्हीं नेताओं में की जाती है, जिनका निजी जीवन सरल और चकाचौंध से अलग था. कुछ लोग भले ही इस बात को सही ना ठहराएं लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू जब 16 कमरों वाले त्रिमूर्ति भवन में रहते थे तब वहां पर भी उनका जीवन बेहद सादगी के साथ बीतता था. आप यकीन नहीं करेंगे कि देश के पहले प्रधानमंत्री को ए.सी. तक में सोना पसंद नहीं था और उनके कमरे में वही पुराना आवाज करने वाला पंखा रहा करता था.


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गर्मियों के दिनों में भी जब वह भोजन के लिए तीन मूर्ति भवन आते थे तब आराम करने के लिए भवन में लगे सोफे पर बैठते थे. उस भवन में एयरकंडीशनर लगा था लेकिन वह सिर्फ वहां आने वाले मेहमानों के लिए ही चलाया जाता था. भोजन करने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने कमरे में चले जाते थे जहां सिर्फ छत पर टंगा एक पंखा और एक टेबल फैन हुआ करता. वो टेबल फैन इतनी आवाज करता था कि आसपास के कमरों तक उसकी आवाज जाती थी.


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इन्दिरा गांधी की सचिव ऊषा भगत ने जब यह पंखा देखा तब उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की देखभाल करने वाले शख्स को इस पंखे को बदलने के लिए कहा. सेवादार ने ऊषा के कहे अनुसार उस पंखे को बदलवा दिया लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब अपने कमरे का पंखा बदला हुआ देखा वह तिलमिला उठे, वह इस हरकत पर बहुत क्रोधित हुए और उसी पुराने पंखे को वापस अपने कमरे में लगवाकर ही माने.


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वर्ष 1956 में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू सऊदी अरब की राजनायिक यात्रा पर गए तो वहां से वापस आते समय शाह सऊद ने उन्हें एक कैडलक कार और उनके साथ आए लोगों को स्विस घड़ियां उपहार में दीं. लेकिन नेहरू इतने महंगे-महंगे तोहफों को पाकर काफी परेशान हो गए थे, वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि यहां से इतने महंगे तोहफे लेकर लौटें. उनके साथ गए एक सदस्य ने उन्हें कहा कि “अगर शाह सऊद आपको कार नहीं देंगे तो उनके पास और है ही क्या आपको देने के लिए. वह आपको रेत का बोरा दें या तेल का पीपा.” इस बात पर नेहरू जोर से हंसे और कार स्वीकार कर ली. भारत लौटते ही उन्होंने कैडलक कार राष्ट्रपति भवन के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी और वर्ष 1956 में तोहफे में मिली यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में शामिल है.


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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kumarvijaynarayansingh के द्वारा
January 22, 2015

त्याग करने वालों को ऐय्याशीनहीं माना जा सकता है। ऐय्याशी मानवात्माएँ दूसरे निर्दोष मानवात्माओं के मानवाधिकारों को छीनतीं हैं। भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना (उदेश्यिका) मेरे समझ से मानवाधिकारों की शतप्रतिशत रक्षक है। परन्तु भारतीय या विश्व का कोई भी राजनेता मानवाधिकारों की चतुर्दिक रक्षा करने में समर्थ सर्वकल्याणकारी रोडमैप प्रदान नहीं किया। बल्कि सभी ने आजतक मानवाधिकारों को लूटने वाली नीतियों को ही अपनाया है। केवल धनोत्पादक (किसानों, कृषिमजदूरों, गैरकृषिमजदूरों तथा इन तीनों के बौद्धिक वंशों को) वर्गों को लूट -लूट कर ही सम्पूर्ण विष्व का तथा भारत का भी विकास हो रहा है। फलस्वरूप ही मानवनिर्मित सम्पूर्ण प्रकार की भौतिक समस्याएँ उत्पन्न हुयीं हैं। जो विष्व को तथा भारत को महाविनाश की ओर ही अग्रसर कर रहीं हैं। इसी लिए मैं आजतक किसी राजनेता को अपना आदर्श बनने के योग्य नहीं माना।

ved के द्वारा
February 10, 2014

is desh ka durbhagya hai k gandhi ek aise vyakti ko support karte the…….Shayad aapne unka allahabad ka ANAND BHAWAN nahi dekha …………..kam se kam aise logo k bare me aisi baat to mat likho………use sant banane ki koshish mat karo …….kyonki woh vyakti ek number ka ayyas tha………….i don’t know why gandhi supported this man…

omdikshit के द्वारा
June 1, 2013

महोदय ,आज के युवा लेखकों या नवजवानों को …नेहरु जी में केवल बुराइयां ही नज़र आती हैं और उन्हें …मुर्ख और शाह-खर्च ही कहा जाता है.

    har har mahadev के द्वारा
    July 18, 2013

    netaon ke dongpan ki suruaat nehru se start hoti hai. sayad apko N D tiwari ki kahani yaad hogi jisne apni secretary ke saath sex relation banakar phenk diya .wo to aaj ki dna techology se sabit ho gaya ki ye unki hi kukarm ka phal hai warna wo ladki to kabhi sabit hi na kar paati.ye ND tiwari bhi unhi jl nehru ke chele hai jo freedom fighter ki aadh mein bahut si ladkiyon ka yon soshan kiya aur samaz mein seena taan kar gumte rahe.


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