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भूल जाएं जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीड़ितों का दर्द ?

Posted On: 20 Feb, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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वर्ष 1997 में क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय और उनके पति की अमृतसर यात्रा के 16 वर्ष बाद पहली बार कोई ब्रिटिश प्रधानमंत्री अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग जाने के लिए तैयार हुआ है. यह वही स्थान है जहां 13 अप्रैल, 1919 के दिन हजारों बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. यह वो समय था जब भारत अंग्रेजी हुकूमत तले घुट-घुट कर सांसें ले रहा था और अपनी आजादी के लिए हर संभव प्रयत्न कर रहा था.

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ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरोन सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी भारत यात्रा का आगाज कर चुके हैं. लेकिन उनकी इस यात्रा को गंभीर मसला माना जा रहा है. हालांकि पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन के अलावा अन्य ब्रिटिश नेता भी इस बात से इंकार कर चुके हैं कि डेविड अमृतसर जाकर 1919 में हुए उस नरसंहार के लिए मांफी मांगेंगे लेकिन अमृतसर के लोगों की यह मांग है कि जब वह जलियांवाला बाग में रखी विजिटर्स बुक पर हस्ताक्षर करें तो साथ-साथ 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए माफीनामा भी लिखकर दें.


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लेकिन ऐसा होना लगभग-लगभग नामुमकिन सा ही है क्योंकि अपनी भारत यात्रा से पहले ही डेविड कैमरोन ने यह साफ कर दिया था कि यह यात्रा दो देशों के बीच व्यापारिक और तकनीकी रिश्ते को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से की जा रही है. डेविड के अनुसार भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले व्यापार और निवेश के मार्ग में जितनी भी कठिनाइयां और जटिल औपचारिकताएं हैं उनके समाधान को ढूंढ़ने के लिए यह यात्रा बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. इसके अलावा अपनी योजनाओं को स्पष्ट करते हुए डेविड कहते हैं कि जितने भी भारतीय व्यापारी ब्रिटेन में निवेश करने के इच्छुक हैं उनके लिए ‘सेम डे वीजा सर्विस’ जैसी योजनाओं की भी शुरुआत की जाएगी.

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जलियांवाला बाग हत्याकांड: कारण और परिणाम

प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका था. गांधी जी को लगा कि अगर इस युद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया गया तो युद्ध समाप्त होने के बाद वह भारतीयों को लेकर थोड़े नर्म हो जाएंगे और उन्हें अपेक्षित रियायतें दे देंगे. इसीलिए उन्होंने हर भारतीय से प्रथन विश्व युद्ध में अंग्रेजों को सहयोग देने के कहा. लेकिन विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा गांधी जी ने सोचा था. पहले की ही तरह भारतीयों पर अत्याचार होते रहे, उन्हें सजाएं मिलती रहीं जिसके चलते भारतीय लोगों में आक्रोश उत्पन्न हो गया. ऐसे हालातों के मद्देनजर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में इस आक्रोश को दबाने के लिए एक समिति का गठन किया गया. समिति द्वारा रोलेट एक्ट पास किया गया जिसके अनुसार किसी भी भारतीय को बिना किसी दलील, बिना किसी अपील के गिरफ्तार किया जा सकता था उन्हें कालापानी भेजा जा सकता था आदि. इस दौरान पंजाब के शांतिप्रिय नेता सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार किया गया जिसके विरोध में उनके समर्थकों ने पहले तो मौन धारण कर प्रदर्शन किया फिर जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने के लिए एकत्रित हुए. लेकिन पंजाब के गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने उन मासूम प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसा दी, जिनके पास बच निकलने का कोई रास्ता नहीं था.

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राजनीतिक दृष्टि से डेविड कैमरोन की यह भारत यात्रा भले ही सफल सिद्ध हो जाए लेकिन जब तक ब्रिटेन के उच्चाधिकारी तत्कालीन औपनिवेशिक भारत के लोगों के साथ हुई इस अमानवीय घटना के लिए माफी नहीं मांग लेते तब तक जख्मों पर मरहम लगना तो बाकी रह ही जाएगा.

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

tamanna के द्वारा
February 21, 2013

कैमरोन ने मांफी तो नहीं मांगी लेकिन अगर मांफी मांग भी लेते तो क्या इतने लंबे समय बाद कोई अंतर पड़ता


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