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अब प्रशासन पर विश्वास नहीं रहा

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इस समाज में किसी घटना के बाद उसके बारे में सोचना और उसके निवारण के विकल्प खोजना एक आदत सी बन गई है. पता नहीं पर ना जाने क्यों इसके लिए पहले से तैयार और अपने बचाव के बारे में यहां नहीं सोचा जाता है. यह एक ऐसा पहलू है जो सामाजिक होने के साथ-साथ राजनैतिक स्तर पर भी अपनी दस्तक देने से नहीं चूकता है और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक समाज से राजनीति अवश्य जुड़ा रहती है. यह जुड़ाव कहीं ना कहीं कुछ ऐसे प्रश्न सामने खड़े करते हैं जो भारत की राजनीति और प्रशासन पर सवालिया निशान उठाते हैं. यह राजनीति हमें कैसी प्रशासन व्यवस्था प्रदान कर रही है यह आज सब के सामने आ ही गया है.


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घर से मत निकलना: कुछ दिनों में शायद भारत की राजनीति और प्रशासन लोगों से यह भी ना आग्रह करने लगें कि कृपया आप घर से ना निकलें क्योंकि हम इतने सक्षम नहीं हैं कि आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ले सकें!! आए दिन देश में हो रहे अपराध के बढ़ते कदम इस बात को पूरी तरह खारिज करते हैं कि हम एक सामान्य और सुरक्षित समाज में रह रहे हैं जहां एक नियमित अंतराल में बलात्कार जैसे अमानवीय घटनाएं घटित हो रही हैं और जिसे रोक पाने में पुलिस और प्रशासन दोनों नाकाम से दिख रहे हैं. जब देश के प्रधान और ‘मेट्रो सिटीज’ कहे जाने वाले शहर की दशा यह है तो कोई भी यह कैसे उम्मीद कर सकता है कि अन्य छोटे शहर इस प्रकार के प्रकोप से बचे रहेंगे. एक महानगर में रात के नौ बजे एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार होता है और पूरा का पूरा प्रशासन  सोता रहता है. अगर ऐसी ही हालत है तो पुलिस और सरकार को साफ लफ्जों में कह देना चाहिए कि घर से मत निकलना!!!


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आश्वासन के दौर जारी हैं: यहां किसी भी घटना के बाद सबसे प्रबल रूप में आश्वासन अपने चेहरे को लेकर सामने आता है. चारों तरफ से आश्वासन की बारिश कितनी भी तेज क्यों ना हो पर पीड़ित के दर्द को कभी भी ठंडक नहीं पहुंचा सकती है. राज्य सभा से लेकर लोक सभा तक विचारों और विमर्शों के बीच क्या इस बात की एक बार भी चर्चा हुई कि ‘हां, हम यह मानते हैं कि जनता की सुरक्षा और उनके विश्वास को जीतने में हम असमर्थ रहे हैं और शायद ऐसा ही रहे और आपको इसी में अपना जीवन पूरा करना करना पड़ सकता है’. दिल्ली की अवस्था किसी से भी छुपी हुई नहीं है, यहां अपराध अपने चरम पर है. अगर देश की राजधानी के बारे में ऐसा कहा जा रहा है तो यहां अन्य शहरों की बात करना ही बेकार है.


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इससे हमको क्या?: अगर सच कहा जाए तो सत्ताधारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है एक लड़की की आबरू चली गई और वो मौत से लड़ रही है, उसकी स्थिति में सुधार बहुत ही धीमी गति से हो रहा है और प्रशासन मात्र उन चारों आरोपियों को पकड़ कर वाह-वाही लूटना चाहता है. क्या यह अमानवीय कृत्य नहीं है? इस पर रूह नहीं कांपती, क्या ऐसी परिस्थितियों से घिन नहीं आती है? जिस प्रकार की राजनीति आज देश में हो रही है वो एक बहुत बड़े चिंता का कारण है कि राजनीति किस ओर समाज को लिए जा रही है. क्या भारतीयों ने स्थिति से जूझना छोड़ दिया है और अपने आप को पूरी तरह से इस मौका परस्त राजनीति के हवाले कर दिया है!!


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प्रेम चतुर्वेदी के द्वारा
November 29, 2014

राजनेता,प्रशासनिक अधिकारी,मीडिया और हमारा समाज सब के सब जख्मों को कुरेदने का काम करते हैं।जख्मों को कुरेद-कुरेद कर कुछ अपनी रोटियाँ सेंकते हैं तो कुछ अपनी जेबें गरम करते हैं वहीं कुछ आनन्द की अनुभूति करते हैं। आज राष्ट्र को जख्म कुरेदने वालों की नहीं जख्मों पर मरहम लगाने वालों की अत्यन्त आवश्यकता है,जिसका शारीरिक,मानसिक और बौध्दिक स्तर पर नितान्त अभाव है। 


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